‘”तुम्हारा इंतज़ार”

(ज़िन्दगी कि तमाम कश्म कश में उलझे हम सभी लोगों को कभी न कभी दिल कि हलचलों को बयान करने कि ज़रुरत सी लगने लगती है! शायद इसके ज़रिये हम खुदको हल्का महसूस करते हैं! दुनिया दारी से दूर खुद कि ही दुनिया में जैसे खोये हुए! मेरा मानना है कि कभी कभी हमारा इसमें उलझना लाज़मिया होता है! अपने अन्दर कि कमियों को दूर फ़ेंक एक अच्छे कल कि ओर जैसे हम आगे बढ़ने लगते हैं! न जाने क्यों कुछ ख्वाहिशों कि नापूरती के बावजूद भी आप एक ही उम्मीद लगाये रखतें हैं, जब तक वो ख्वाहिश पूरी नहीं हो जाती! जब तक वो तड़पाता हुआ सपना सच में नहीं बदल जाता, वो उम्मीद जागी रहती है! ये जो फ़ज़ल है उसी को बयां करने कि कोशिश कर रही है, थोड़े से शामियाना अंदाज़ में……;) )

वो सुन्दर चेहरा तुम्हारा,
वो कोमल तन तुम्हारा,
तुम्हारा वो भोला-भाला पन,
और स्पष्ट-शुची मन,
कुदरत का नायब नगीना हो तुम,
मेरे लिए सारा जहान हो तुम,
डरता हूँ कि तुमसे बिचड़ न जाऊं,
मरता हूँ कि तुम्हारे पास भी कभी आऊँ,
बस यादें हैं तुम्हारी, बस यादें हैं तुम्हारी,
मेरी रहें हैं खाली, मेरी रहें हैं खाली !

कैसे जाऊं मैं तुम्हारे पास,
कैसे कहूं मैं दिल कि आस,
कि जितना मैं चाहता तुम्हें,
उतना ही दूर हो जाता तुमसे,
तुम्हारी यादों का मैं दीवाना हूँ,
तुम्हारे प्यार का मैं परवाना हूँ,
डरता हूँ कि तुमसे बिचड़ न जाऊं,
मरता हूँ कि तुम्हारे पास भी कभी आऊँ,
बस यादें हैं तुम्हारी, बस यादें हैं तुम्हारी,
मेरी रहें हैं खाली, मेरी रहें हैं खाली !

ये तनहाइयां हैं काटने को दौड़ती,
ये खामोशियाँ मुझे आज कुतर्तीं,
तुम ही हो वो दवा,
जो इस घाव को मिटा सकती,
तुम ही हो वो पानी,
जो मेरी प्यास बुझा सकती,
डरता हूँ कि तुमसे बिचड़ न जाऊं,
मरता हूँ कि तुम्हारे पास भी कभी आऊँ,
हाँ जो यादें हैं तुम्हारी, वो यादें रहेंगी तुम्हारी,
जो राहें थीं खाली, वो अब न रहेंगी खाली!!!

फिर से उठी है वही बहार,
न जाने क्यों है तुम्हारा इंतज़ार !!!

(Copyright: Kanad Pankaj Jha)

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